शनिवार, 13 दिसंबर 2014

पपीहे का प्रण : Papeehe ka Prn : By Sanjay Mehta Ludhiana









कबीर साहिब एक दिन गंगा के किनारे घूम रहे थे। उन्हों ने देखा एक पपीहा प्यास से बेहाल होकर नदी में गिर गया है। पपीहा स्वांति नक्षत्र में बरसने वाली वर्षा की बूंदो के अलावा और कोई पानी नहीं पीता। उसके चारो और कितना ही पानी मजूद क्यों ना हो , उसे कितनी ही जोर से प्यास क्यों न लगी हो , वह मरना मजूर करेगा , परन्तु और किसी पानी से अपनी प्यास नहीं बुझायेगा।
कबीर साहिब नदी में गिरे हुए उस पक्षी की और देखते रहे। सख्त गर्मी पड़ रही थी , पर नदी के पानी की एक बूँद भी नहीं पी। उसे देखकर कबीर साहिब ने कहा :
जब मै इस छोटे -से पपीहे की वर्षा के निर्मल जल के प्रति भक्ति और निष्ठां देखता हूँ की प्यास से मर रहा है। लेकिन जान बचाने के लिए नदी का पानी नहीं पीता , तो मुझे मेरे ईश्वर के प्रति अपनी भक्ति तुच्छ लगने लगती है
पपीहे का पन देख के , धीरज रही न रंच।
मरते दम जल का पड़ा, तोउ न बोडी चंच। ।
अगर हर भक्त को अपने इष्ट के प्रति पपीहे जैसी तीव्र लगन और प्रेम हो तो वह बहुत जल्दी ऊँचे रूहानी मंडलों में पहुंच जाये। अब कहिये जय माता दी जय देवी माँ








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